हारने का मेरा इरादा न था

पर मैं क्या करता बस में ज़्यादा न था

ज़िंदगी को सबक़ सिखाना है
ख़ुद से ऐसा भी कोई वा'दा न था

एक बिस्तर से ख़्वाब देखूँ बस
मेरा ये ख़्वाब भी कुशादा न था

कुछ मुसाफ़िर छुपा गए सच को
वो सफ़र था सियाह सादा न था

क्यूँ न खाता मैं ठोकरें दरदर
मैं किसी घर का शाहज़ादा न था

मैं ने मंज़िल पे जाके देखा है
उस जगह पर भी इस्तिफ़ादा न था

इस लिए लम्स का पता न चला
ग़म था मुझ पे मैं बेलिबादा न था

— Kinshu Sinha

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Irada Shayari

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