mere dam se vo jeete hain magar hamdam nahin hote | मेरे दम से वो जीते हैं मगर हमदम नहीं होते

  - Kinshu Sinha

मेरे दम से वो जीते हैं मगर हमदम नहीं होते
वो दिल के ज़ख़्म होते हैं मगर मरहम नहीं होते

बुरा क्या है अगर उसका कोई आसूँ न निकला तो
वो पैदाइश है उस घर की जहाँ मातम नहीं होते

यहाँ पर बात आई है हमारे कुछ उसूलों की
उसे बदनाम जो करते तो हम भी हम नहीं होते

अब आलम है यही तो इसपे कोई बात क्या करना
कुछ ऐसा वैसा क्या करते जो ये आलम नहीं होते

मज़ा तो सामने से अजनबी होने पे आता है
जो छुप जाते हैं सब सेे वो छुपे रुस्तम नहीं होते

यहाँ माँ बाप भी बहनों के हिस्से में नहीं आते
रिवायत का यही कहना है उनके ग़म नहीं होते

ग़मों से दूर होना तो बग़ावत है ख़ुदाई से
जो कहते हैं कि ख़ुश हैं हम वो झूठे कम नहीं होते

किसी को घर बदलना हो तो कैसा दोष मौसम का
बुरे तो लोग होते हैं बुरे मौसम नहीं होते

  - Kinshu Sinha

Ghar Shayari

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