है ख़िज़ाँ या बहार वो लड़की
या है इन सबके पार वो लड़की
शब चमकती है उस की बातों से
बिजली की एक तार वो लड़की
उस को भी इंकलाब लाना है
है बहुत शानदार वो लड़की
ऐसा लगता है कब से मेरा ही
करती है इंतिज़ार वो लड़की
मैं नहीं कहता क़ीमती हूँ मैं
कहती है बार बार वो लड़की
सिर्फ़ मैं ही नहीं फ़िदा उस पे
हर जहाँ की पुकार वो लड़की
वो मुझे होशियार कहती है
है बहुत होशियार वो लड़की
इक तो दिल्ली है दूर काफ़ी और
मिलने को बेक़रार वो लड़की
एक पल बर्फ़ सी है, अगले पल
एक सौ दो बुख़ार वो लड़की
जाम पीना है उस को मेरे संग
करती है ऐतिबार वो लड़की
रब्त बेनाम ठीक तो है पर
सच कहूँ तो है प्यार वो लड़की















