लहरों में डूबती कश्ती को भी अक्सर देखा
फिर भी बाँहों में समुंदर को समा कर देखा
इक मुसाफ़िर ने दहन मोड़ लिया साहिल से
जब समुंदर की ये लहरों को घड़ी-भर देखा
टूट जाते हैं मोहब्बत में पशेमानी से जो
बस उन्हीं लोगों को ही बनता सुख़न-वर देखा
मैं ज़माने को ग़लत क्या ही कहूँ जब मैंने
अपने ही दोस्तों में एक सितमगर देखा
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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