safar men apne vo rakht-e-safar ko bhool ga.e | सफ़र में अपने वो रख़्त-ए-सफ़र को भूल गए

  - Harsh Kumar Bhatnagar

सफ़र में अपने वो रख़्त-ए-सफ़र को भूल गए
सुनहरी धूप में सोए शजर को भूल गए

कलाम पढ़ते हैं दिल टूटने का महफ़िल में
ये कच्ची उम्र के बच्चे हुनर को भूल गए

जो सीपियों में समुंदर का शोर सुनते थे
वो अहल-ए-अक़्ल भी ख़ुद अब भँवर को भूल गए

लगी है लत ये परिंदों को जब से पिंजरों की
सफ़र तो क्या ही करेंगे शजर को भूल गए

मिला नहीं है दर-ओ-बाम जिन को क़िस्मत में
सड़क पे सोते हैं मरने के डर को भूल गए

जो इंतिज़ार में दिन भी गुज़ार लेते थे वो
मुसाफ़िरों से मिले मुंतज़र को भूल गए

  - Harsh Kumar Bhatnagar

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