रोष इतना बढ़ा-बढ़ा सा है
हर कोई फिर ख़फ़ा-ख़फ़ा सा है
एक इल्ज़ाम से ही दिल टूटा
फिर भी तेरा नशा-नशा सा है
हुस्न भी शबनमी लगा तेरा
फूल जैसे खिला-खिला सा है
इक बड़े हादिसे से ही यारों
दिल-जला फिर ख़फ़ा-ख़फ़ा सा है
गुफ़्तगू क्या करे किसी से अब
हिज्र में दिल बुझा-बुझा सा है
बाग़ में फूल एक ऐसा है
रंग उसका उड़ा-उड़ा सा है
हश्र भी इम्तिहान ही लेता
हाँ नतीजा भला-भला सा है
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