टूट जाए यक़ीन जब कोई
क्यूँ करे इंतिजार तब कोई
देखने से लगा वो अपना ही
जान ले तू हसब-नसब कोई
दौड़ता जब दिमाग़ ही सब का
सीखता तब नया लक़ब कोई
तोड़ती दम अगर सियासत ही
डोर था
में तभी 'अजब कोई
आदमी होशियार वह लगता
सीख फिर जीने के सबब कोई
जब बयाँ हिज्र हो सितारों से
झिलमिलाते कटे न शब कोई
रूठ के ही गया 'मनोहर' वो
छोड़ जाए न दोस्त कब कोई
As you were reading Shayari by Manohar Shimpi
our suggestion based on Manohar Shimpi
As you were reading undefined Shayari