रात वैसे क्यूँ अभी मेरी गुज़रती ही नहीं
शाम पहले की तरह अब तो ठहरती ही नहीं
सब निगाहें या ज़बाँ से ही समझता हूँ अभी
देख के भी महज़ अनदेखा वो करती ही नहीं
आज कल क्यूँ वो ख़फ़ा रहती ख़ुदा जाने बहुत
हम-नशीं शाम-ओ-सहर में भी सँवरती ही नहीं
ज़िक्र अब क्या हम जुदाई का किसी से ही करें
फिर बिरह में मेरी तन्हाई गुज़रती ही नहीं
मेरे दिल की वो गिरह क्यूँ अब सुलझती है नहीं
अब फ़ज़ा वैसे कभी भी फिर निखरती ही नहीं
क्या नसीहत दूँ उसे अब वो समझती है नहीं
बात उसके ही गले से क्यूँ उतरती ही नहीं
वक़्त चलते क्या नहीं बदला 'मनोहर' अब यहाँ
पहले जैसी फिर ख़ुशी देखो बिखरती ही नहीं
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