raat vaise kyun abhii meri guzrati hi nahin | रात वैसे क्यूँ अभी मेरी गुज़रती ही नहीं

  - Manohar Shimpi

रात वैसे क्यूँ अभी मेरी गुज़रती ही नहीं
शाम पहले की तरह अब तो ठहरती ही नहीं

सब निगाहें या ज़बाँ से ही समझता हूँ अभी
देख के भी महज़ अनदेखा वो करती ही नहीं

आज कल क्यूँ वो ख़फ़ा रहती ख़ुदा जाने बहुत
हम-नशीं शाम-ओ-सहर में भी सँवरती ही नहीं

ज़िक्र अब क्या हम जुदाई का किसी से ही करें
फिर बिरह में मेरी तन्हाई गुज़रती ही नहीं

मेरे दिल की वो गिरह क्यूँ अब सुलझती है नहीं
अब फ़ज़ा वैसे कभी भी फिर निखरती ही नहीं

क्या नसीहत दूँ उसे अब वो समझती है नहीं
बात उसके ही गले से क्यूँ उतरती ही नहीं

वक़्त चलते क्या नहीं बदला 'मनोहर' अब यहाँ
पहले जैसी फिर ख़ुशी देखो बिखरती ही नहीं

  - Manohar Shimpi

Intiqam Shayari

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