बता बाद-ए-सबा कितनी सुहानी है
ख़ुशी ज़ुल्फ़ों से फिर चेहरे पे आनी है
बहारों संग चलके ही पता चलता
फ़ज़ा की ये महक कितनी रुमानी है
सुकूँ तो ढूँढने से ही नहीं मिलता
जियो उस्लूब से ये जिंदगानी है
कई तूफ़ान ही आए गए जानाँ
तेरी बस मुस्कुराहट शादमानी है
बिखर कर ही हुए बे-घर कई समझो
उभर आई मुसीबत आसमानी है
फले-फूले खिले गुल हैं कई लेकिन
सिवा तेरे कोई ख़ुशबू न आनी है
'मनोहर' रंग होली का चढ़े जब भी
तभी गुजिया भी तो खानी खिलानी है
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