'उम्र कोई भी हो सब बच्चियाँ हँसा करतीं
बात बात पर थोड़े लड़कियाँ हँसा करतीं
फूल सी ही बेटी माँ बाप को कहाँ मिलती
इत्तिफ़ाक़ हो तो फिर तितलियाँ हँसा करतीं
अस्ल में बयारों से लौटके ख़ुशी आती
झूमते हुए भी तो बालियाँ हँसा करतीं
साथ जब कभी पूरा खानदान ही रहता
सिर्फ़ उन मकानों की खिड़कियाँ हँसा करतीं
'इश्क़ में फ़साने क्या और फिर मनाने क्या
वक़्त पर मनाया तो लड़कियाँ हँसा करतीं
क़ैद में 'मनोहर' जब सख़्त ही सज़ा होती
बेगुनाह हैं उन पर बेड़ियाँ हँसा करतीं
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