कहना था बातों बातों में
घनी घनी उन बरसातों में
कहना सुनना तो था ही पर
कशिश कहाँ थी उन बातों में
अच्छे क्यूँ लगते तब जुगनू
तवील सी गुज़री रातों में
जब-जब मैं मुज़्तर पर बोला
अजीब लर्ज़िश थी बातों में
ख़ामोशी भी क्या होती है
सुनी सुनाई बारातों में
मदहोश होता क्यूँँ मिलने पर
लगे हसीं जब वो रातों में
जैसे समझे वैसे कहते
कहें 'मनोहर' जज़्बातों में
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