क़िस्सा हमें हमदम सुनाते ही रहे
सुन के वही दिल फिर दुखाते ही रहे
हम इस जहाँ के ही मुसाफ़िर ही तो हैं
दौलत फ़क़त फिर क्यूँँ जुटाते ही रहे
इतनी मुहब्बत जब तुम्हें करते सनम
क्यूँँ इस क़दर आँखें चुराते ही रहे
देखे हुए सपने सभी सच्चे ही हैं
फिर ख़्वाब में क्यूँँ ही रुलाते ही रहे
कोई ख़ता हो तो ख़बर कर दो हमें
उसके लिए क्यूँँ दिल दुखाते ही रहे
इतना दिल-ओ-दिल चाहते हम थे उन्हें
ता-'उम्र दिल से फिर मनाते ही रहे
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