इब्तिदा-ए-ख़ल्क़ से उलझी रही अदयान में

  - Mohiuddin Qamaruddin Ansari

इब्तिदा-ए-ख़ल्क़ से उलझी रही अदयान में
जी तो चाहे फेंक दूँ दुनिया को कूड़ेदान में

सरकशी करती रही थी हर क़दम पर ज़िन्दगी
'उम्र भर घिरते रहे हम इक नये बोहरान में

एहतिराम और प्यार होती थी सिफ़त सब की कभी
अब ये ख़ूबी भी नज़र आती नहीं इंसान में

अब गुनाहों का हमें एहसास रहता ही नहीं
लग गई हो जैसे दीमक दौलत-ए-ईमान में

मुब्तिला हैं सब तज़बज़ुब में करें तो क्या करें
फ़र्क़ दिखता ही नहीं अब आदमी शैतान में

सब को ही देना पड़ेगा अपने कर्मों का हिसाब
बच न पाएगा कोई भी हश्र के मैदान में

हमने सिखलाया है दुनिया को उख़ूव्वत का सबक़
आज भी ज़िंदा है ये तहज़ीब हिन्दोस्तान में

होड़ सी सब में लगी है सब से आगे होने की
साथ चलता ही नहीं कोई भी अब अकवान में

अब कहीं लगता नहीं दिल दश्त हो या अंजुमन
छोड़ आए जब से दिल हम 'इश्क़ के दालान में

जाएगा बच कर कहाँ तक ज़िन्दगी से तू 'उमर'
बहना ही है हर किसी को वक़्त के तूफ़ान में

  - Mohiuddin Qamaruddin Ansari

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