जाने कैसा नसीब था मेरा

मुझ से रूठा रहा ख़ुदा मेरा

ख़ुशनुमा सुब्ह चाँदनी रातें
बस तसव्वुर ही रह गया मेरा

हर क़दम पर रहा वो साथ मगर
बन न पाया वो रहनुमा मेरा

ज़िन्दगी इस गुमान में गुज़री
मेरा अपना था हमनवा मेरा

डूबने भी न दे न पार करे
जाने कैसा है नाख़ुदा मेरा

बन न पाया जो था ख़यालों में
एक छोटा सा ही कदा मेरा

रश्क़ से देखता ही कौन 'उमर'
कुछ न था ख़ास मर्तबा मेरा

— Mohiuddin Qamaruddin Ansari

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