hamaari baat ko tum tak koii pahuncha gaya tha kya | हमारी बात को तुम तक कोई पहुँचा गया था क्या

  - Nityanand Vajpayee

हमारी बात को तुम तक कोई पहुँचा गया था क्या
दिखाकर आईना सच का तुम्हें दहला गया था क्या

बशर जो छोड़ आया है रिवाज़ों की क़वायद को
मेरे जैसा ही ये भी रस्मों से उकता गया था क्या

तुम्हारा दिल मुझे लगता कि चकनाचूर है इकदम
किसी पत्थर से ये शीशा कहीं टकरा गया था क्या

निभाया आसमाँ ने 'इश्क़ धरती से तो सब बोले
ये अंबर भी ज़मीं के प्यार में बौरा गया था क्या

सज़ा-ए-मौत जब उसको मिली सबने कहा कुछ यूँँ
ये मुजरिम क़त्ल करते वक़्त ही पकड़ा गया था क्या

लो उसने झूठ की बुनियाद पर ही बाँध ली बिल्डिंग
वो सच्चाई के हुजरे से बहुत घबरा गया था क्या

  - Nityanand Vajpayee

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