isse badhkar aur kya mujhko khazana chahiye | इस सेे बढ़कर और क्या मुझको ख़ज़ाना चाहिए

  - Nityanand Vajpayee

इस सेे बढ़कर और क्या मुझको ख़ज़ाना चाहिए
बस तेरी ज़ुल्फ़ों में ख़ुद का आशियाना चाहिए

एक पिंजरे में गुजारे इतने दिन क्या कम है ये
अब तो इस पंछी को अंबर तोड़ जाना चाहिए

माँ गई उस दिन से मैं यूँँ सोचता रहता हूँ बस
हो न हो उस रूह को फिर लौट आना चाहिए

बूढ़े बाशिंदों ने क्यूँ छोड़ा हमारे घर को यूँँ
कुछ भी करके अब उन्हें हमने मनाना चाहिए

आपकी इस मेहरबानी को नहीं भूलेंगे हम
आपने इस दिल का रस्ता भूल जाना चाहिए

बस बुज़ुर्गों के ही क़दमों में है ज़न्नत सा सुकूँ
नित्य हर अखबार में इसको छपाना चाहिए

  - Nityanand Vajpayee

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