खौफ़ आईने से लगने लगा है अब सबको
सच किसी शूल सा दिल पे लगा है अब सबको
दुश्मनों को भी 'अजब डर है मेरी ताक़त का
ग़म का अजगर ही मसकने लगा है अब सबको
तोप तलवार गनों का है ज़माना ये नहीं
यह मोबाइल ही निगलने लगा है अब सबको
ख़ुद के दुख से तो दुखी कोई ज़माने में नहीं
ग़ैर का सुख ही खटकने लगा है अब सबको
मौत महबूब के जैसी है सो ले जाएगी
एक सच और ये खलने लगा है अब सबको
झूठ पर झूठ मढ़ा जाए तो भी सच सच है
सच का सच होना कसकने लगा है अब सबको
'नित्य' ग़मगीन हुए जाते हैं उल्फ़त वाले
नाग नफ़रत का ये डसने लगा है अब सबको
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