ख़ुद के महबूब का हम कैसे पता भूल गए
इक तो बीमार थे और दूजे दवा भूल गए
एक दो दिन ही हुए मुझ सेे बिछड़ कर उनको
साँस लेने के लिए वो भी हवा भूल गए
ज्यूँ ही हिरनी की तरह उसने कुलाँचे मारीं
हम नशे में तो थे पर सारा नशा भूल गए
'इश्क़ का रोग लगा उनको जो मुझ सेे मिलकर
तबसे वो हँसने हँसाने की अदा भूल गए
इतने दिन बीत गए कॉल न मैसेज कोई
कैसे उल्फ़त में निभाना वो वफ़ा भूल गए
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