मोहब्बत वोहब्बत बहाना है सबकुछ
किसी रोज़ तुमने गँवाना है सबकुछ
ये महले दोमहले ये मीनार-ओ-मेहराब
यहीं छोड़कर सबने जाना है सबकुछ
मुसलमान हिंदू ईसाई हो या सिक्ख
बस इक नूर में ही समाना है सबकुछ
करम नेक कर लो यही साथ होंगे
वगरना तो झूठा ख़ज़ाना है सबकुछ
ये भौतिक सुखों का है जंजाल उपमन्यु
यहीं का यहीं ताना-बाना है सबकुछ
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