न जाने क्यूँ वो झूठी बद-गुमानी छेड़ देते हैं
अहम के ग्राफ़ ख़ुद की ही ज़बानी छेड़ देते हैं
कोई मौक़ा' नहीं वो छोड़ते मशहूर होने का
ज़रा सी बात पर अपनी कहानी छेड़ देते हैं
किसी से मुफ़्त में ही मुँह फुलाकर बैठ जाते और
उसी को बे-वजह कहकर गुमानी छेड़ देते हैं
नहीं शर्मिंदगी उनको है अपनी बेवकूफ़ी पर
हर इक 'आलिम से अपनी सीना तानी छेड़ देते हैं
गुमान 'उपमन्यु' उनको है बहुत ज़रदार होने का
ज़र-ए-फ़ाज़िल की बातें आसमानी छेड़ देते हैं
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