बारूद की फ़सलों में कहीं फल नहीं देखा
हथियारों से होता तो कोई हल नहीं देखा
उस छाँव में मिलता था सुकूॅं सब से ज़ियादा
ऐ माँ तेरे आँचल सा तो आँचल नहीं देखा
बचपन में बिछौनों के तले थी जो पराली
वैसा तो मुलाइम कहीं मख़मल नहीं देखा
मुझ सेे ही उलझती है सरेआम वो अक्सर
उस जैसा जहाँ भर में भी पागल नहीं देखा
पत्थर पे उगे दूब बरस जाने से जिसके
ऐसा तो गगन भर में भी बादल नहीं देखा
फुटपाथ बिछा ओढ़ लिया नभ को उन्होंने
मज़दूरों के जिस्मों पे तो कम्बल नहीं देखा
व्यापार किया फूलों का कांटों के नगर में
'उपमन्यु' तेरी ज़िद सा महाबल नहीं देखा
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