गिले शिकवे शिकायत ग़म गिनाना भूल जाते हैं
तुम्हें मिलते हैं तो सारा फ़साना भूल जाते हैं
बढ़ी है लालफ़ीताशाहों की यूँँ ज़्यादती अब तो
अदब इंसानियत के भी निभाना भूल जाते हैं
लिया है संकटों से भी सबक़ हमने तो दुनिया में
हमारी सम्त में ग़म यूँँ भी आना भूल जाते हैं
मची है लूट पैसों की भला इंसाँ की क्या क़ीमत
खनक पे नाचते छम-छम लजाना भूल जाते हैं
न साधू है न बाबा है न अब कोई फ़कीरा है
फॅंसे लालच में रब से लौ लगाना भूल जाते हैं
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