ye zindagi hai ki aaseb ka safar hai miyaan | ये ज़िंदगी है कि आसेब का सफ़र है मियाँ

  - Qaisar-ul-Jafri

ये ज़िंदगी है कि आसेब का सफ़र है मियाँ
चराग़ ले के निकलना बड़ा हुनर है मियाँ

पता चले जो मोहब्बत का दर्द ले के चलो
मिरे मकाँ की गली कितनी मुख़्तसर है मियाँ

नहाएँगी मिरी ज़ौ में हज़ार-हा सदियाँ
मैं वो चराग़ नहीं हूँ जो रात भर है मियाँ

तुम्हारी रात पे इतना ही तब्सिरा है बहुत
मकीं अँधेरे में हैं चाँदनी में घर है मियाँ

लिखा है वक़्त ने सदियों सफ़र के बा'द उसे
ये दौर झूट सही फिर भी मो'तबर है मियाँ

मिलेगी राख न तुम को हमारे चेहरे पर
बदन में रह के सुलगना बड़ा हुनर है मियाँ

अब इंतिज़ार की ताक़त नहीं रही 'क़ैसर'
कुछ और रोज़ न सोचा तो सब खंडर है मियाँ

  - Qaisar-ul-Jafri

Safar Shayari

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