Ameeta Parsuram Meeta

Ameeta Parsuram Meeta

@ameeta-parsuram-meeta

Ameeta Parsuram Meeta shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ameeta Parsuram Meeta's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ज़िंदगी अपना सफ़र तय तो करेगी लेकिन हम-सफ़र आप जो होते तो मज़ा और ही था — Ameeta Parsuram Meeta

Ghazal

कह भी दूँ हाल-ए-दिल अगर शायद उन पे हो जाए कुछ असर शायद अब ज़माना है बे-वफ़ाई का सीख लें हम भी ये हुनर शायद बा'द मुद्दत के ये ख़याल आया रास आया नहीं सफ़र शायद हम ही अब तक समझ नहीं पाए कुछ तो कहती है वो नज़र शायद वैसे तो फ़ासला नहीं कोई कश्मकश है अगर मगर शायद हर नज़ारे में उस का ही जल्वा तुम को आता नहीं नज़र शायद अजनबी अजनबी से चेहरे हैं ये नहीं है मिरा नगर शायद नींद तारी है आसमानों पर या दुआ में नहीं असर शायद अब कोई आरज़ू नहीं बाक़ी ख़त्म होता है ये सफ़र शायद मौज-दर-मौज एक नश्शा था अब वो दरिया गया उतर शायद ज़िंदगी अब तुझे सँवारे क्या कोशिशें सारी बे-असर शायद इक जहाँ अजनबी रहा 'मीता' इक जहाँ मुझ से बा-ख़बर शायद — Ameeta Parsuram Meeta
क्या मैं इक हर्फ़ था लिखा यूँँ ही मेरा होना भी बस हुआ यूँँ ही जानती हूँ कि तुम को प्यार नहीं यूँँ ही मुझ को लगा लगा यूँँ ही इक ख़ुदा की वो बात करता था और फिर हो गया ख़ुदा यूँँ ही क्या पता कब क़ुबूल हो जाए तू भी तो माँग लीं दुआ यूँँ ही एक ख़दशा है बहके क़दमों से ढूँड ही लें न रास्ता यूँँ ही वो हमारे थे और हम उन के आ गई दरमियाँ अना यूँँ ही तुम ने जो कुछ कहा कहा यूँँ ही मैं ने भी सुन लिया सुना यूँँ ही एक लम्हे में दिल हुआ उन का हो गया था ये फ़ैसला यूँँ ही क्या ज़रूरी है मंज़िलों का सफ़र तू भी चल कोई रास्ता यूँँ ही मुख़्तसर सी है दास्ताँ 'मीता' हर कोई बस जिया जिया यूँँ ही — Ameeta Parsuram Meeta
रोज़-ए-अज़ल से जारी सज़ाओं का सिलसिला फिर भी थमा नहीं है ख़ताओं का सिलसिला क़ाएम है अब भी मेरी वफ़ाओं का सिलसिला इक सिलसिला है उन की जफ़ाओं का सिलसिला अब अश्क-बार होते नहीं हैं दु'आओं में नाकाम यूँँ हुआ है दु'आओं का सिलसिला पाँव तले ज़मीं न मिला आसमाँ कोई मेरा सफ़र है जैसे ख़लाओं का सिलसिला आज़ाद हो चुकी हूँ हर इक सिलसिले से मैं ले जाए अब कहीं भी हवाओं का सिलसिला ख़ुद साख़्ता ख़ुदाओं ने जीना किया मुहाल रब जाने कब रुकेगा ख़ुदाओं का सिलसिला मुफ़्लिस की ज़िंदगी तो है मुफ़्लिस की ज़िंदगी ख़ामोश अन-कही सी सदाओं का सिलसिला — Ameeta Parsuram Meeta
मोहब्बत उम्र भर की राएगाँ करना नहीं अच्छा सँभल ऐ दिल अना को आसमाँ करना नहीं अच्छा कुछ ऐसे राज़ होते हैं बयाँ करना नहीं अच्छा हर इक चेहरे की सच्चाई अयाँ करना नहीं अच्छा किसी नाकाम हसरत की जो सुलगे आग सीने में हवा यादों की मत देना ध्याँ करना नहीं अच्छा चमन में हूँ तो फिर मैं भी चमन का एक हिस्सा हूँ तग़ाफ़ुल इतना मेरे बाग़बाँ करना नहीं अच्छा हिफ़ाज़त से उतारो अश्क-ए-ग़म को दिल की सीपी में किसी क़तरे को बहर-ए-बे-कराँ करना नहीं अच्छा उजाले ही नहीं है तीरगी भी ज़ीस्त का हासिल कि इन तारीकियों को बे-ज़बाँ करना नहीं अच्छा — Ameeta Parsuram Meeta
खींच लाया तुझे एहसास-ए-तहफ़्फ़ुज़ मुझ तक हम-सफ़र होने का तेरा भी इरादा कब था दर-गुज़र करती रही तेरी ख़ताएँ बरसों मेरे जज़्बात ओ ख़यालात तू समझा कब था मौज-दर-मौज भँवर खींच रहा था मुझ को मेरी कश्ती के लिए कोई किनारा कब था ज़ाहिरन साथ वो मेरे था मगर आँखों से बद-गुमानी के नक़ाबों को उतारा कब था तुझ को मालूम नहीं अपनी वफ़ाओं के एवज़ जान-ए-जाँ मैं ने जो चाहा था ज़ियादा कब था दो किनारों को मिलाया था फ़क़त लहरों ने हम अगर उस के न थे वो भी हमारा कब था उस ने मेरी ही रिफ़ाक़त को बनाया मुल्ज़िम मैं अगर भीड़ में थी वो भी अकेला कब था वो तिरा अहद-ए-वफ़ा याद है अब तक 'मीता' भूल बैठी हूँ मोहब्बत का ज़माना कब था — Ameeta Parsuram Meeta
सुब्ह-ए-रौशन को अँधेरों से भरी शाम न दे दिल के रिश्ते को मिरी जान कोई नाम न दे मोड़ आते ही मुझे छोड़ के जाने वाले फिर से तन्हाइयाँ बे-चैनियाँ कोहराम न दे मुझ को मत बाँध वफ़ादारी की ज़ंजीरों में मैं कि बादल हूँ भटक जाने का इल्ज़ाम न दे मुतमइन दोनों हैं मैं और मेरी तर्ज़-ए-हयात तिश्नगी मेरे मुआफ़िक़ है कोई जाम न दे आसमाँ देने का ऐ दोस्त दिखावा मत कर मुझ को उड़ने की इजाज़त तू तह-ए-दाम न दे हाँ निभाए हैं मोहब्बत के फ़राएज़ मैं ने मुस्तहिक़ भी हूँ मगर कोई भी इन'आम न दे दिल के अफ़्साने का आग़ाज़ हसीं है 'मीता' सिलसिला यूँँही चले कोई भी अंजाम न दे — Ameeta Parsuram Meeta