रोज़-ए-अज़ल से जारी सज़ाओं का सिलसिला
फिर भी थमा नहीं है ख़ताओं का सिलसिला
क़ाएम है अब भी मेरी वफ़ाओं का सिलसिला
इक सिलसिला है उन की जफ़ाओं का सिलसिला
अब अश्क-बार होते नहीं हैं दु'आओं में
नाकाम यूँ हुआ है दु'आओं का सिलसिला
पाँव तले ज़मीं न मिला आसमाँ कोई
मेरा सफ़र है जैसे ख़लाओं का सिलसिला
आज़ाद हो चुकी हूँ हर इक सिलसिले से मैं
ले जाए अब कहीं भी हवाओं का सिलसिला
ख़ुद साख़्ता ख़ुदाओं ने जीना किया मुहाल
रब जाने कब रुकेगा ख़ुदाओं का सिलसिला
मुफ़्लिस की ज़िंदगी तो है मुफ़्लिस की ज़िंदगी
ख़ामोश अन-कही सी सदाओं का सिलसिला
— Ameeta Parsuram Meeta















