kya main ik harf tha likha yuñ hi | क्या मैं इक हर्फ़ था लिखा यूँँ ही

  - Ameeta Parsuram Meeta

क्या मैं इक हर्फ़ था लिखा यूँँ ही
मेरा होना भी बस हुआ यूँँ ही

जानती हूँ कि तुम को प्यार नहीं
यूँँ ही मुझ को लगा लगा यूँँ ही

इक ख़ुदा की वो बात करता था
और फिर हो गया ख़ुदा यूँँ ही

क्या पता कब क़ुबूल हो जाए
तू भी तो माँग लीं दुआ यूँँ ही

एक ख़दशा है बहके क़दमों से
ढूँड ही लें न रास्ता यूँँ ही

वो हमारे थे और हम उन के
आ गई दरमियाँ अना यूँँ ही

तुम ने जो कुछ कहा कहा यूँँ ही
मैं ने भी सुन लिया सुना यूँँ ही

एक लम्हे में दिल हुआ उन का
हो गया था ये फ़ैसला यूँँ ही

क्या ज़रूरी है मंज़िलों का सफ़र
तू भी चल कोई रास्ता यूँँ ही

मुख़्तसर सी है दास्ताँ 'मीता'
हर कोई बस जिया जिया यूँँ ही

  - Ameeta Parsuram Meeta

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