अगर है ज़िंदगी इक जश्न तो ना-मेहरबाँ क्यूँ है

फ़सुर्दा रंग में डूबी हुई हर दास्ताँ क्यूँ है

तुम्हें हम से मोहब्बत है हमें तुम से मोहब्बत है
अना का दायरा फिर भी हमारे दरमियाँ क्यूँ है

वही सब कुछ रज़ा उस की तो फिर दिल में गुमाँ क्यूँ है
सवालों और जवाबों से परेशाँ मेरी जाँ क्यूँ है

हर इक मंज़र के पस-मंज़र में तेरा ही करिश्मा है
यक़ीनन ख़ालिक़-ए-कुन तू तो आँखों से निहाँ क्यूँ है

तुझी को है मुयस्सर हर बुराई का दमन करना
तो ना-इंसाफ़ियों के दौर में तू बे-ज़बाँ क्यूँ है

— Ameeta Parsuram Meeta

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