Amanat Lakhnavi

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Amanat Lakhnavi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Amanat Lakhnavi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

बोसा आँखों का जो माँगा तो वो हँस कर बोले देख लो दूर से खाने के ये बादाम नहीं — Amanat Lakhnavi
किस तरह 'अमानत' न रहूँ ग़म से मैं दिल-गीर आँखों में फिरा करती है उस्ताद की सूरत — Amanat Lakhnavi

Ghazal

आग़ोश में जो जल्वागर इक नाज़नीं हुआ अंगुश्तरी बना मिरा तन वो नगीं हुआ रौनक़-फ़ज़ा लहद पे जो वो मह-जबीं हुआ गुम्बद हमारी क़ब्र का चर्ख़-ए-बरीं हुआ कंदा जहाँ में कोई न ऐसा नगीं हुआ जैसा कि तेरा नाम मिरे दिल-नशीं हुआ रौशन हुआ ये मुझ पे कि फ़ानूस में है शम्अ' हाथ उस का जल्वागर जो तह-ए-आस्तीं हुआ रखता है ख़ाक पर वो क़दम जब कि नाज़ से कहता है आसमान न क्यूँँ मैं ज़मीं हुआ रौशन शबाब में जो हुई शम-ए-रू-ए-यार दूद-ए-चराग़ हुस्न-ए-ख़त-ए-अम्बरीं हुआ या रब गिरा अदू पे 'अमानत' के तू वो बर्क़ दो टुकड़े जिस से शहपर-ए-रूहुल-अमीं हुआ — Amanat Lakhnavi
लुत्फ़ अब ज़ीस्त का ऐ गर्दिश-ए-अय्याम नहीं मय नहीं यार नहीं शीशा नहीं जाम नहीं कब मुझे याद रुख़ ओ ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम नहीं कोई शग़्ल इस के सिवा सुब्ह से ता शाम नहीं हर सुख़न पर मुझे देता है वो बद-ख़ू दुश्नाम कौन सी बात मिरी क़ाबिल-ए-ईनाम नहीं नेक-नामी में दिला फ़िरक़ा-ए-उश्शाक़ हैं इश्क़ है वो बदनाम मोहब्बत में जो बदनाम नहीं चेहरा-ए-यार के सौदे में कहा करता हूँ रुख़ है ये सुब्ह नहीं ज़ुल्फ़ है ये शाम नहीं बोसा आँखों का जो माँगा तो वो हँस कर बोले देख लो दूर से खाने के ये बादाम नहीं हल्क़ा-ए-ज़ुल्फ़-ए-बुताँ में है भरी निकहत-ए-गुल ऐ दिल इस लाम में बू-ए-गुल-ए-इस्लाम नहीं इब्तिदा इश्क़ की है देख 'अमानत' हुश्यार ये वो आग़ाज़ है जिस का कोई अंजाम नहीं — Amanat Lakhnavi
ख़ाना-ए-ज़ंजीर का पाबंद रहता हूँ सदा घर अबस हो पूछते मुझ ख़ानमाँ-बर्बाद का इश्क़-ए-क़द्द-ए-यार में क्या ना-तवानी का है ज़ोर ग़श मुझे आया जो साया पड़ गया शमशाद का ख़ुद-फ़रामोशी तुम्हारी ग़ैर के काम आ गई याद रखिएगा ज़रा भूले से कहना याद का ख़त लिखा करते हैं अब वो यक क़लम मुझ को शिकस्त पेच से दिल तोड़ते हैं आशिक़-ए-नाशाद का इशक़-ए-पेचाँ का चमन में जाल फैला देख कर बुलबुलों को सर्व पर धोका हुआ सय्याद का क़ामत-ए-जानाँ से करता है अकड़ कर हम-सरी हौसला देखे तो कोई सर्व-ए-बे-बुनियाद का बे-ज़बानी में 'अमानत' की वो हैं गुल-रेज़ियाँ नातिक़ा हो बंद ऐ दिल बुलबुल-ए-नाशाद का — Amanat Lakhnavi
सुब्ह-ए-विसाल-ए-ज़ीस्त का नक़्शा बदल गया मुर्ग़-ए-सहर के बोलते ही दम निकल गया दामन पे लोटने लगे गिर गिर के तिफ़्ल-ए-अश्क रोए फ़िराक़ में तो दिल अपना बहल गया दुश्मन भी गर मरे तो ख़ुशी का नहीं महल कोई जहाँ से आज गया कोई कल गया सूरत रही न शक्ल न ग़म्ज़ा न वो अदा क्या देखें अब तुझे कि वो नक़्शा बदल गया क़ासिद को उस ने क़त्ल किया पुर्ज़े कर के ख़त मुँह से जो उस के नाम हमारा निकल गया मिल जाओ गर तो फिर वही बाहम हों सोहबतें कुछ तुम बदल गए हो न कुछ मैं बदल गया मुझ दिल-जले की नब्ज़ जो देखी तबीब ने कहने लगा कि आह मिरा हाथ जल गया जीता रहा उठाने को सद में फ़िराक़ के दम वस्ल में तिरा न 'अमानत' निकल गया — Amanat Lakhnavi
उलझा दिल-ए-सितम-ज़दा ज़ुल्फ़-ए-बुताँ से आज नाज़िल हुई बला मिरे सर पर कहाँ से आज तड़पूँगा हिज्र-ए-यार में है रात चौदहवीं तन चाँदनी में होगा मुक़ाबिल कताँ से आज दो-चार रश्क-ए-माह भी हमराह चाहिएँ वा'दा है चाँदनी में किसी मेहरबाँ से आज हंगाम-ए-वस्ल रद्द-ओ-बदल मुझ से है अबस निकलेगा कुछ न काम नहीं और हाँ से आज क़ार-ए-बदन में रूह पुकारी ये वक़्त-ए-नज़अ मुद्दत के बा'द उठते हैं हम इस मकाँ से आज खींची है चर्ख़ ने भी किसी माँग की शबीह साबित हुई ये बात मुझे कहकशाँ से आज अंधेर था निगाह-ए-'अमानत' में शाम सहर तुम चाँद की तरह निकल आए कहाँ से आज — Amanat Lakhnavi
दिखलाए ख़ुदा उस सितम-ईजाद की सूरत इस्तादा हैं हम बाग़ में शमशाद की सूरत याद आती है बुलबुल पे जो बेदाद की सूरत रो देता हूँ मैं देख के सय्याद की सूरत आज़ाद तिरे ऐ गुल-ए-तर बाग़-ए-जहाँ में बे-जाह-ओ-हशम शाद हैं शमशाद की सूरत जो गेसू-ए-जानाँ में फँसा फिर न छुटा वो हैं क़ैद में फिर ख़ूब है मीआ'द की सूरत खींचेंगे मिरे आईना-रुख़्सार की तस्वीर देखे तो कोई मानी-ओ-बहज़ाद की सूरत गाली के सिवा हाथ भी चलता है अब उन का हर रोज़ नई होती है बेदाद की सूरत किस तरह 'अमानत' न रहूँ ग़म से मैं दिल-गीर आँखों में फिरा करती है उस्ताद की सूरत — Amanat Lakhnavi
भूला हूँ मैं आलम को सरशार इसे कहते हैं मस्ती में नहीं ग़ाफ़िल हुश्यार इसे कहते हैं गेसू इसे कहते हैं रुख़्सार इसे कहते हैं सुम्बुल इसे कहते हैं गुलज़ार इसे कहते हैं इक रिश्ता-ए-उल्फ़त में गर्दन है हज़ारों की तस्बीह इसे कहते हैं ज़ुन्नार इसे कहते हैं महशर का किया वा'दा याँ शक्ल न दिखलाई इक़रार इसे कहते हैं इनकार इसे कहते हैं टकराता हूँ सर अपना क्या क्या दर-ए-जानाँ से जुम्बिश भी नहीं करती दीवार इसे कहते हैं दिल ने शब-ए-फ़ुर्क़त में क्या साथ दिया मेरा मूनिस इसे कहते हैं ग़म-ख़्वार इसे कहते हैं ख़ामोश 'अमानत' है कुछ उफ़ भी नहीं करता क्या क्या नहीं ऐ प्यारे अग़्यार इसे कहते हैं — Amanat Lakhnavi
रूह को राह-ए-अदम में मिरा तन याद आया दश्त-ए-ग़ुर्बत में मुसाफ़िर को वतन याद आया चुटकियाँ दिल में मिरे लेने लगा नाख़ुन-ए-इश्क़ गुल-बदन देख के उस गुल का बदन याद आया वहम ही वहम में अपनी हुई औक़ात बसर कमर-ए-यार को भूले तो दहन याद आया बर्ग-ए-गुल देख के आँखों में तिरे फिर गए लब ग़ुंचा चटका तो मुझे लुत्फ़-ए-सुख़न याद आया दर-ब-दर फिर के दिला घर की हमें क़द्र हुई राह-ए-ग़ुर्बत में जो भूले तो वतन याद आया आह क्यूँँ खेंच के आँखों में भर आए आँसू क्या क़फ़स में तुझे ऐ मुर्ग़-ए-चमन याद आया फिर 'अमानत' मिरा दिल भूल गया ऐश ओ तरब फिर मुझे रौज़ा-ए-सुल्तान-ए-ज़मन याद आया — Amanat Lakhnavi
गिर पड़े दाँत हुए मू-ए-सर ऐ यार सफ़ेद क्यूँँ न हो ख़ौफ़-ए-अजल से ये सियहकार सफ़ेद दो क़दम फ़र्त-ए-नज़ाकत से नहीं चल सकता रंग हो जाता है उस का दम-ए-रफ़्तार सफ़ेद उस मसीहा की जो आँखें हुईं गुलज़ार में सुर्ख़ हो गई ख़ौफ़ से बस नर्गिस-ए-बीमार सफ़ेद गुल-ए-नसरीं को नहीं जोश चमन में बुलबुल है नज़ाकत के सबब चेहरा-ए-गुलज़ार सफ़ेद घर मिरे शब को जो वो रश्क-ए-क़मर आ निकला हो गए परतव-ए-रुख़ से दर ओ दीवार सफ़ेद लब ओ दंदाँ के तसव्वुर में जो रोया मैं कभी अश्क दो-चार बहे सुर्ख़ तो दो-चार सफ़ेद हुई सरसब्ज़ जो सोहबत में 'अमानत' की ग़ज़ल रंग दुश्मन का हुआ रश्क से इक बार सफ़ेद — Amanat Lakhnavi
रवाँ दवाँ नहीं याँ अश्क चश्म-ए-तर की तरह गिरह में रखते हैं हम आबरू गुहर की तरह सुनी सिफ़त किसी ख़ुश-चश्म की जो मरदुम से ख़याल दौड़ गया आँख पर नज़र की तरह छुपी न ख़ल्क़-ए-ख़ुदास हक़ीक़त-ए-ख़त-ए-शौक़ उड़ा जहाँ में कबूतर मिरा ख़बर की तरह सिवाए यार न देखा कुछ और आलम में समा गया वो मिरी आँख में नज़र की तरह अदम की राह में खटका रहा जहन्नम का सफ़र ने दिल को जलाया मिरे सक़र की तरह खुले जो सब तो बंधा तार मीठी बातों का शकर गिरह में वो रखते हैं नेशकर की तरह वो अंदलीब हूँ शहपर जो मेरा मिल जाए चढ़ाएँ सर पे सलातीं हुमा के पर की तरह ज़कात दे ज़र-ए-गुल की बहार में गुलचीं चमन में फूल लुटा अशरफ़ी के ज़र की तरह गिरी है छुट के जो ज़ानू पे शाम को अफ़्शाँ सितारे यार के दामन में हैं सहर की तरह मुशाइरे का 'अमानत' है किस को हिज्र में होश कहाँ के शे'र कहाँ की ग़ज़ल किधर की तरह — Amanat Lakhnavi
हैं जल्वा-ए-तन से दर-ओ-दीवार बसंती पोशाक जो पहने है मिरा यार बसंती क्या फ़स्ल-ए-बहारी ने शगूफ़े हैं खिलाए माशूक़ हैं फिरते सर-ए-बाज़ार बसंती गेंदा है खिला बाग़ में मैदान में सरसों सहरा वो बसंती है ये गुलज़ार बसंती उस रश्क-ए-मसीहा का जो हो जाए इशारा आँखों से बने नर्गिस-ए-बीमार बसंती गेंदों के दरख़्तों में नुमायाँ नहीं गेंदे हर शाख़ के सर पर है ये दस्तार बसंती मुँह ज़र्द दुपट्टे के न आँचल से छुपाओ हो जाए न रंग-ए-गुल-ए-रुख़्सार बसंती खिलती है मिरे शोख़ पे हर रंग की पोशाक ऊदी, अगरी, चम्पई, गुलनार, बसंती है लुत्फ़ हसीनों की दो-रंगी का 'अमानत' दो चार गुलाबी हों तो दो चार बसंती — Amanat Lakhnavi
ज़मज़मा किस की ज़बाँ पर ब-दिल-ए-शाद आया मुँह न खोला था कि पर बाँधने सय्याद आया क़द जो बूटा सा तिरा सर्व-ए-रवाँ याद आया ग़श पे ग़श मुझ को चमन में तह-ए-शमशाद आया ले उड़ी दिल को सू-ए-दश्त हवा-ए-वहशत फिर ये झोंका मुझे कर देने को बर्बाद आया किस क़दर दिल से फ़रामोश किया आशिक़ को न कभी आप को भूले से भी मैं याद आया दिल हुआ सर्व-ए-गुलिस्ताँ के नज़ारे से निहाल शजर-ए-क़ामत-ए-दिलदार मुझे याद आया हो गई क़त्अ असीरी में उमीद-ए-परवाज़ उड़ गए होश जो पर काटने सय्याद आया हो गया हसरत-ए-परवाज़ में दिल सौ टुकड़े हम ने देखा जो क़फ़स को तो फ़लक याद आया — Amanat Lakhnavi