sabke hisse men koii shahzaa | सबके हिस्से में कोई शहज़ादी हो

  - Atul K Rai

सबके हिस्से में कोई शहज़ादी हो
जिससे प्रेम करें उससे ही शादी हो

एक मुक़दमा ऐसा भी आवश्यक है
जिस
में वादी ही अपना प्रतिवादी हो

हमको भी रोने की इच्छा होती है
हमको भी तो रोने की आज़ादी हो

गाँव घुमाने को दादा का कन्धा हो
और कहानी कहने को इक दादी हो

ऐसे गर आबाद हुए भी हम तो क्या
जिसके एवज़ में केवल बर्बादी हो

  - Atul K Rai

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