तुरत निर्णय सुना देना बहुत दुष्कर रहा है

खंडर जिस को बताया जा रहा है घर रहा है

कहीं ये रेल पटरी से उतर जाए न फिर से
हमारा मन बहुत घबरा रहा है डर रहा है

हमें वो ढीठ जिस अंदाज़ से बतला रहा है
ढिठाई और करने का इशारा कर रहा है

वहाँ इक नाम का पूरा लिखा होना ग़ज़ब है
किसी के नाम का पहला जहाँ अक्षर रहा है

बिता दी उम्र जिस ने पैरवी करते वफ़ा की
मुहब्बत की नज़र में बस वही कमतर रहा है

हया की नाव पर संकट के बादल छा गए हैं
बचा था आँख में पानी वो भी अब मर रहा है

— Atul K Rai

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