kabhi aisa nahin lagta kabhi waisa nahin lagta | कभी ऐसा नहीं लगता कभी वैसा नहीं लगता

  - Rakesh Mahadiuree

कभी ऐसा नहीं लगता कभी वैसा नहीं लगता
मुझे या रब तेरी दुनिया में कुछ अच्छा नहीं लगता

तुम्हारे साथ है कोई तो उस का ज़र्फ़ है जानी
वगरना छोड़ जाने में कोई पैसा नहीं लगता

बहुत लड़ते झगड़ते थे मगर अब जान पड़ता है
तुम्हारे बिन मुझे इस शहर में अच्छा नहीं लगता

मुहब्बत चार दिन की थी जवानी चार दिन की है
मगर इस चार दिन में भी किसी को क्या नहीं लगता

ग़ज़ल तहज़ीब जैसी है ये फ़न बारूद जैसा है
कभी मिसरा नहीं लगता कभी नुक़्ता नहीं लगता

मुहब्बत चार दिन की चाँदनी है फिर कहाँ होगी
मगर ऐ बद्र साहब आदमी को क्या नहीं लगता

ये दुनिया किसकी होती है चलो सबको ही जाना है
मगर 'राकेश' माँ बिन घर भी तो पूरा नहीं लगता

  - Rakesh Mahadiuree

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