लब को एक इबादत ज़िंदा रखती है

जैसे देह को ताक़त ज़िंदा रखती है

कभी कभी तो हम को ऐसा लगता है
सब को अपनी क़िस्मत ज़िंदा रखती है

पतझड़ भी अपने में सुंदर है लेकिन
बाग़ों को भी रंगत ज़िंदा रखती है

सबका मिलना दोस्त कहाँ हो पाता है
हम जैसों को हसरत ज़िंदा रखती है

इतनी ख़्वाहिश दोस्त मुकम्मल क्या होगी
सब को एक शिकायत ज़िंदा रखती है

नक़्ल किए तो वक़्त में मारे जाओगे
सब को अपनी फ़ितरत ज़िंदा रखती है

प्यार मुहब्बत सबकी तलब नहीं होती
किसी किसी को नफ़रत ज़िंदा रखती है

छोड़ के जिस्म निकल जाता पर सोचा हूँ
मरे हुओं को तुर्बत ज़िंदा रखती है

सब अपने में एक सिकंदर हैं लेकिन
सब को अपनी क़ुदरत ज़िंदा रखती है

उस दुनिया की और कहानी है लेकिन
इस दुनिया को उल्फ़त ज़िंदा रखती है

अपनी इक तस्वीर बनाओ लफ़्ज़ों से
शाइ'र को इक शिद्दत ज़िंदा रखती है

कोई पूछे कैसे हो तो ऐ 'राकेश'
कह देना तुम चाहत ज़िंदा रखती है

— Rakesh Mahadiuree

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