रहें जब दोस्तों के साथ चाहे कम सताते हो
मगर जब तन्हा होते हैं हमें तुम याद आते हो
बचाएँ कैसे हम ख़ुद को बताओ तो ज़रा जानाँ
हमें तुम सेे मुहब्बत है हमें तुम ही सताते हो
मुहब्बत कोई कितने दिन भुला के बैठ सकता है
बहुत दिन हो गए बिछड़े कि अब तुम याद आते हो
इसी दहलीज़ पे हम आज दम तोड़ेंगे ऐ साक़ी
वहाँ से वो भगाता है यहाँ से तुम भगाते हो
जला के अब तुम्हारा मय-कदा हम ख़ाक कर देंगे
सुने हैं मय-कशों को तुम बहुत कम-कम पिलाते हो
बहुत मजबूर होकर हम तुम्हारे दर पे आए हैं
ज़रूरत-मंद हम भी हैं कि हमको क्यूँ भगाते हो
यक़ीं है जब तुम्हें उनपर कि समझेंगे वो हाल-ए-दिल
तो फिर राकेश तुम उन सेे मुहब्बत क्यूँ छुपाते हो
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