अज़िय्यतों से निकलने का मशवरा देती
मैं उस की थी तो नहीं फिर भी हौसला देती
किसी अज़ाब से कम तो नहीं है ख़ुश रहना
दुआ के नाम पे क्यूँँ उस को बद-दुआ' देती
छुपा भी लेती मेरे भेद को अगर बिल-फ़र्ज़
हवा का क्या है कोई और गुल खिला देती
बजा कि सहल न था उस का हम-सफ़र होना
कम-अज़-कम उस को पलटने का रास्ता देती
जो मुझ से 'इश्क़ के क़िस्से सुनाता फिरता था
कहीं वो मिलता तो मैं उस को आइना देती
मेरे ख़ुदा कोई मसरफ़ तो होता अश्कों का
फ़सील-ए-शहर की तहरीर ही मिटा देती
ख़ुदा गवाह कि सर से झटक के देख लिया
नहीं था बस में वगर्ना उसे भुला देती
मैं उस की ख़ास इनायत से बच गई हूँ 'क़मर'
वगर्ना ख़ल्क़-ए-ख़ुदा तो मुझे मिटा देती
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