मैं जब भी याद की शमएँ जला के रखती हूँ
ये मेरी ज़िद है कि आगे हवा के रखती हूँ
मैं टूट सकती हूँ लेकिन मैं झुक नहीं सकती
शिकस्त-ए-ज़ात में पहलू अना के रखती हूँ
वो बादबाँ है अगर कश्ती-ए-मोहब्बत का
मैं बादबान से रिश्ते हवा के रखती हूँ
नहीं है घर में तेरी याद के अलावा कुछ
तो किस के सामने चाय बना के रखती हूँ
तुम्हारे ख़त हैं महकते गुलाब के मानिंद
वो और खुलते हैं जितना छुपा के रखती हूँ
जो कहना चाहती हूँ वो तो कह नहीं पाती
ज़बाँ पे तज़्किरे आब-ओ-हवा के रखती हूँ
मैं जानती हूँ कि आना नहीं किसी ने 'क़मर'
मगर मुंडेर पे शमएँ जला के रखती हूँ
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