ख़तों का सिलसिला आख़िर हुआ बंद
दरीचा ख़्वाब सारा माजरा बंद
तेरे इक लम्स से खुलते थे ताले
तेरे बिन दिल का हर इक ज़ाविया बंद
नज़र मिलते ही पलकों ने ये ठाना
तेरे जाने का हर इक रास्ता बंद
जो कहना था वही लब तक न आया
हमारे दरमियाँ हर सिलसिला बंद
ख़मोशी ओढ़कर बैठे हैं हम अब
कि नालिश बंद हर इक इल्तिज़ा बंद
ख़ुदा के हुक्म पर ठहरा ये रिश्ता
न मैंने कुछ कहा हर मशवरा बंद
जहाँ में शोर का आलम बहुत है
मगर दिल से दिलों का राब्ता बंद
जो आँखें नूर की पहचान थीं कल
उन्हीं में आज हर इक आइना बंद
लिखा है 'इश्क़ ने आख़िर यही सच
कि साँसें चल रही हैं हौसला बंद
क़लम थक-सी गई अल्फ़ाज़ रूठे
सुख़न ख़ामोश है हर क़ाफ़िया बंद
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