हुस्न जब ज़ेवर-ए-उल्फ़त से सँवर जाता है
नूर बनकर वो दिल-ओ-जाँ में उतर जाता है
दिल किसी और के पीछे नहीं चलता हरगिज़
दिल उधर जाता है महबूब जिधर जाता है
चोट खाता है मोहब्बत में किसी का जब दिल
'इश्क़ का भूत तो दो दिन में उतर जाता है
आज भी उसको मोहब्बत है यक़ीनन मुझ सेे
जब भी मिलता है वो पल भर को ठहर जाता है
वो थिरकता है लहू बनके मेरी नस-नस में
और फिर मेरे ख़यालों में बिखर जाता है
लब पे हल्का सा तबस्सुम भी अगर आ जाए
हुस्न फिर उसका बहारों सा निखर जाता है
ऐसे इंसाँ पे रज़ा कैसे भरोसा कर लें
करके वा'दा जो हमेशा ही मुकर जाता है
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