एक रोज़ हम भी याँ कुछ कमाल लिक्खेंगे
क़ब्ल क़ब्ल उलफ़त की जब मिसाल लिक्खेंगे
इक तरफ़ लिखेंगे हम ख़ूबसूरती जग की
इक तरफ़ तुम्हारे लब और गाल लिक्खेंगे
एक झटके में जिस
में सब ही कुछ समा जाए
आँखों को तुम्हारी हम भीमताल लिक्खेंगे
वक़्त को भी लिक्खेंगे हम हिसाब से अपने
हिज्र के दिनों को हम सालों साल लिक्खेंगे
लोग लिखते हैं अक्सर दूरी दरमियाँ सबके
दरमियाँ धरा नभ के हम विसाल लिक्खेंगे
जिसको देख तम का मुख पीला पड़ने लग जाए
हम तुम्हारे चेहरे को याँ उजाल लिक्खेंगे
लब ख़मोश रहते हैं आँखें बात करती हैं
'इश्क़ का अनोखा याँ ये मक़ाल लिक्खेंगे
सोचते ही होंठों पर इबतिसाम छा जाए
तुमको हम यहाँ ऐसा इक ख़याल लिक्खेंगे
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