मैं तेरे ज़ुल्म दिखाता हूँ अपना मातम करने के लिए

  - Saqi Faruqi

मैं तेरे ज़ुल्म दिखाता हूँ अपना मातम करने के लिए
मेरी आँखों में आँसू आए तिरी आँखें नम करने के लिए

मिट्टी से हुआ मंसूब मगर आतिश-ख़ाना सा जलता हूँ
कई सूरज मुझ में डूब गए मेरा साया कम करने के लिए

वो याद के साहिल पर सारे मोती बिखराए बैठी थी
इक लहर लहू में उट्ठी थी मुझे ताज़ा-दम करने के लिए

आज अपने ज़हरस काट दिया सब ज़ंग पुराने लफ़्ज़ों का
आइंदा के अंदेशों की तारीख़ रक़म करने के लिए

मुमकिन है कि अब भी होंटों पर कोई भूला बिसरा शो'ला हो
मैं जलते जलते राख हुआ लहजा मद्धम करने के लिए

  - Saqi Faruqi

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