ik yaad kii maujoodgi sah bhi nahin sakte | इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते

  - Saqi Faruqi

इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते
ये बात किसी और से कह भी नहीं सकते

  - Saqi Faruqi

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As you were reading Shayari by Saqi Faruqi

    बुझे लबों पे है बोसों की राख बिखरी हुई
    मैं इस बहार में ये राख भी उड़ा दूँगा
    Saqi Faruqi
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    दामन में आँसुओं का ज़ख़ीरा न कर अभी
    ये सब्र का मक़ाम है गिर्या न कर अभी

    जिस की सख़ावतों की ज़माने में धूम है
    वो हाथ सो गया है तक़ाज़ा न कर अभी

    नज़रें जला के देख मनाज़िर की आग में
    असरार-ए-काएनात से पर्दा न कर अभी

    ये ख़ामुशी का ज़हर नसों में उतर न जाए
    आवाज़ की शिकस्त गवारा न कर अभी

    दुनिया पे अपने इल्म की परछाइयाँ न डाल
    ऐ रौशनी-फ़रोश अँधेरा न कर अभी
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    Saqi Faruqi
    मुद्दत हुई इक शख़्स ने दिल तोड़ दिया था
    इस वास्ते अपनों से मोहब्बत नहीं करते
    Saqi Faruqi
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    अब घर भी नहीं घर की तमन्ना भी नहीं है
    मुद्दत हुई सोचा था कि घर जाएँगे इक दिन
    Saqi Faruqi
    वो लोग जो ज़िंदा हैं वो मर जाएँगे इक दिन
    इक रात के राही हैं गुज़र जाएँगे इक दिन

    यूँ दिल में उठी लहर यूँ आँखों में भरे रंग
    जैसे मिरे हालात सँवर जाएँगे इक दिन

    दिल आज भी जलता है उसी तेज़ हवा में
    ऐ तेज़ हवा देख बिखर जाएँगे इक दिन

    यूँ है कि तआक़ुब में है आसाइश-ए-दुनिया
    यूँ है कि मोहब्बत से मुकर जाएँगे इक दिन

    यूँ होगा कि इन आँखों से आँसू न बहेंगे
    ये चाँद सितारे भी ठहर जाएँगे इक दिन

    अब घर भी नहीं घर की तमन्ना भी नहीं है
    मुद्दत हुई सोचा था कि घर जाएँगे इक दिन
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    Saqi Faruqi

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