गरेबाँ चाक अपना सी रहे हैं
मगर शर्तों पे अपनी जी रहे हैं
ख़लिश ऐसी है फुरक़त में तुम्हारी
मुसलसल रात से हम पी रहे हैं
नया इक दौर है आगे हमारे
गुज़िश्ता दौर में हम जी रहे हैं
मोहब्बत के सितम सब ज़ब्त कर के
लबों को आप अपने सी रहे हैं
अगर हो रिन्द तो अंदर बुला लो
हो गर जो शेख़ कहना पी रहे हैं
बने हैं आबरू अब जो तुम्हारी
कभी पहलू में मेरे भी रहे हैं
— Shadan Ahsan Marehrvi















