काफ़ी नहीं कि चेहरे से चेहरे उतार दूँ

  - Shahid Zaki

काफ़ी नहीं कि चेहरे से चेहरे उतार दूँ
तू चाहता है मैं तेरे कपड़े उतार दूँ

कुत्ते करे ख़ुदाई तो कैसे उतार दूँ
मिट्टी में लाश किस के भरोसे उतार दूँ

दरिया-ए-सुस्त मेरे तमव्वुज के साथ चल
ऐसा न हो मैं तुझे किनारे उतार दूँ

लाशों भरी ज़मीं ने कहा आसमान से
मैं भी अगर तुम्हारे सितारे उतार दूँ

बच्चे जवान और शजर बूढ़े हो गए
अब वक़्त हो चला है कि झूले उतार दूँ

मक़्दूर हो तो रस्म-ए-मुसावात चल पड़े
मंज़ूर हो तो क़ब्रों से कत्बे उतार दूँ

मुमकिन है दूर ग़ैरत-ए-सैलाब जाग उठे
सूखे समुंदरों में सफ़ीने उतार दूँ

गर्द-ओ-ग़ुबार से परे लटकी हुई धनक
तू थक गई है तो तुझे नीचे उतार दूँ

माहौल साफ़ हो तो बदन साफ़ रहते हैं
ला मैं तेरे मकान से जाले उतार दूँ

ठहरे हुए समय मेरे हाथों में हाथ दे
गाहे तुझे चढ़ाऊँ दूँ गाहे उतार दूँ

दिल तक जो जीने आए थे मा'दूम हो चुके
तुझ को कहाँ उतार दूँ कैसे उतार दूँ

खींचू तवह्हुम और तवक्कुल में इक लकीर
दलदल में नाव लहर में तिनके उतार दूँ

मेह्र-ओ-मह-ओ-नुजूम कोई मसअला नहीं
बस आप हुक्म कीजिए कितने उतार दूँ

'शाहिद' अगर दुआ की उड़न-तश्तरी को मैं
दोज़ख़ से और बहिश्त से आगे उतार दूँ

  - Shahid Zaki

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