aa ke le jaa.e meri aankh ka paani mujh se | आ के ले जाए मेरी आँख का पानी मुझ से

  - Shahid Zaki

आ के ले जाए मेरी आँख का पानी मुझ से
क्यूँँ हसद करती है दरिया की रवानी मुझ से

मांस नाख़ुन से अलग कर के दिखाया मैंने
उसने पूछे थे जुदाई के मआ'नी मुझ से

सिर्फ़ इक शख़्स की ख़ातिर मुझे बर्बाद न कर
रोज़ रोते हुए कहती है जवानी मुझ से

उस के हाथों पे मैं होठों के निशाँ छोड़ आया
उस ने माँगी थी मुहब्बत की निशानी मुझ से

मेरी हालत का उसे इल्म है 'शाहिद' फिर भी
चाहता है कि सुने मेरी ज़ुबानी मुझ से

  - Shahid Zaki

More by Shahid Zaki

As you were reading Shayari by Shahid Zaki

Similar Writers

our suggestion based on Shahid Zaki

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari