hai azal se jiska dushman ye zamaana ishq hai | है अज़ल से जिसका दुश्मन ये ज़माना इश्क़ है

  - Shakir Dehlvi

है अज़ल से जिसका दुश्मन ये ज़माना इश्क़ है
हर तरफ़ क़ातिल निगाहें और निशाना इश्क़ है

देख कर मुझको तुम्हारा मुस्कुराना इश्क़ है
और ज़रा सी बात पर फिर रूठ जाना इश्क़ है

पहले खो देना उसे अपनी अना के वास्ते
फिर उसी की याद में दिल को जलाना इश्क़ है

दो मुलाक़ातें हुई हैं और वो भी मुख़्तसर
लग रहा है मुझको यूँँ सदियों पुराना इश्क़ है

जब भी मिलते हैं तो करते हैं ग़ज़ल पर गुफ़्तगू
उसके मेरे दरमियाँ इक शाइराना इश्क़ है

जब मदद साहिल पे हो बस इक सदा की मुंतज़िर
ऐसे में ख़ामोश रह कर डूब जाना इश्क़ है

चैन दिन का नींद रातों की और इस दिल का सुकूँ
सब गँवा कर जो मिला हमको ख़ज़ाना इश्क़ है

मुद्दतों के बाद वो हम सेे मिला और यूँँ मिला
कह उठे सब देखने वाले पुराना इश्क़ है

  - Shakir Dehlvi

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