है अज़ल से जिसका दुश्मन ये ज़माना इश्क़ है
हर तरफ़ क़ातिल निगाहें और निशाना इश्क़ है
देख कर मुझको तुम्हारा मुस्कुराना इश्क़ है
और ज़रा सी बात पर फिर रूठ जाना इश्क़ है
पहले खो देना उसे अपनी अना के वास्ते
फिर उसी की याद में दिल को जलाना इश्क़ है
दो मुलाक़ातें हुई हैं और वो भी मुख़्तसर
लग रहा है मुझको यूँँ सदियों पुराना इश्क़ है
जब भी मिलते हैं तो करते हैं ग़ज़ल पर गुफ़्तगू
उसके मेरे दरमियाँ इक शाइराना इश्क़ है
जब मदद साहिल पे हो बस इक सदा की मुंतज़िर
ऐसे में ख़ामोश रह कर डूब जाना इश्क़ है
चैन दिन का नींद रातों की और इस दिल का सुकूँ
सब गँवा कर जो मिला हमको ख़ज़ाना इश्क़ है
मुद्दतों के बाद वो हम सेे मिला और यूँँ मिला
कह उठे सब देखने वाले पुराना इश्क़ है
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