आप के रब्त पर ज़बाँ ठहरी

लफ़्ज़ महरूम दास्ताँ ठहरी

मैं बयाँ इश्क़ को न कर पाया
नज़्म भी मेरी बे-ज़बाँ ठहरी

इक सितारा ही मैं ने चाहा था
हाथ में आ के कहकशाँ ठहरी

इक ख़ुशी ही नहीं ठहर पाई
बे-क़रारी जहाँ-तहाँ ठहरी

मेरी आवारगी को देखा जब
फिर न कोई गली यहाँ ठहरी

सब्र का फल रहा न शीरीं अब
देर की तो न गाड़ियाँ ठहरी

आप भी हो ग़लत फ़हम तब से
तल्ख़ियाँ जब से दरमियाँ ठहरी

रुक गई ज़िन्दगी जो बिछड़े हम
' शान ' पर ये क़लम कहाँ ठहरी

— Shan Sharma

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