ज़मीं की बेरुख़ी सह के यूँ घायल हो गया हूँ
समुन्दर चूम के मैं यार बादल हो गया हूँ
ज़माने के किताबी इल्म से ऊपर हूँ अब मैं
ये जाहिल कह रहे मुझको कि पागल हो गया हूँ
रुआँसी रूह घुट के मर गई है इस बदन में
निगल के जिस्म की मैं रेत दलदल हो गया हूँ
तुम्हारे साथ तो थोड़ी ख़लाएँ भी यहाँ थी
तुम्हारे बाद तो यक्सर मुकम्मल हो गया हूँ
बहारें पूछने आई थीं कल शब हाल मेरा
ख़िज़ाँ ने कह दिया पतझड़ का आँचल हो गया हूँ
मुझे गुमनाम कह के ' शान ' तुम तो चल दिए थे
तुम्हारे नाम का दुश्मन मुसलसल हो गया हूँ
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