क्या मिली कुछ इलाजकारी है
जौन मुझ को भी बेक़रारी है
तुम तो पहले गुज़ार बैठे थे
ग़म की शब मैं ने क्यूँ गुज़ारी है
ऐन फिर शीन काफ़ के जुमले
इश्क़ बद-हाल लत हमारी है
दौर है ये हसीन सूरत का
ज़ख़्म की दिल पे दाग़दारी है
मुस्कुराहट लबों पे तारी है
हाँ मगर वो भी झूठ सारी है
मैं वो बदज़ात हूँ कि अब जिस को
ख़ुल्द की धूल ना-गवारी है
चाँद की चाहतें बसर कर के
आँख लगती चकोर भारी है
'शान' टुकड़ों में जोड़ के जी लो
ज़िंदगी साँस की सवारी है
— Shan Sharma















