आज दम-भर के लिए भी नहीं देखा तू ने
आख़िरश कर ही दिया मुझ को पराया तू ने
जाने किस बात पे मैं तुझ से ख़फ़ा रहता था
जाने क्या काम मिरा यार बिगाड़ा तू ने
हाथ तेरे भी गरेबान तलक आ पहुँचे
जब दिखावा न हुआ रंग दिखाया तू ने
ग़ैर को बा'द में अपना तू बनाता बेशक
पहले मुझ से तो किया होता किनारा तू ने
जान लेने पे तुला है तो रुका है क्यूँ अब
मुझ को मर ने से कई बार बचाया तू ने
और लोगों ने तिरा हाथ बटाया ही था
संग तो मेरी तरफ़ फेंका था पहला तू ने
मन ही मन में तो रहा करता था थोड़ा ख़ुश मैं
हँसते हँसते हुए वो हक़ भी है छीना तू ने
— Sohil Barelvi















