रोज़ मुझ को तबाह करते हैं
कुछ तो आसेब मुझ में ऐसे हैं
दूर जाता नहीं हूँ तुझ सेे यूँँ
दूर कब जाने वाले लौटे हैं
जाने वालों को हम नहीं रोते
जाने वाले पराए होते हैं
चारागर भी दवा करे कब तक
अब तो ज़ख़्मों से ज़ख़्म रिसते हैं
मैंने बचपन कभी नहीं देखा
मेरे औज़ार ही खिलौने हैं
आपके दुख पे मैं नहीं रोता
आप क्यूँँ मेरे दुख पे रोते हैं
मैं हूँ महरूम इक ज़माने से
ख़ैर तू ने तो अपने देखे हैं
ऐसा महसूस हो रहा सोहिल
मेरे मरहूम पास बैठे हैं
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